वो अपने ख्वाब को पैरों से रौंदा रोज़ करता है
इसलिए ही तो आइने से पर्दा रोज़ करता है
न जाने किसने कह दिया उससे उदासी तलाश कर
इसलिए ही वो बज़्मो में भटका रोज़ करता है
नहीं मुझको पसंद ख्वाहिश ए दिल की परस्ती अब
मगर ये दिल ख्वाहिश ए दीदार पैदा रोज़ करता है
वो ज़ालिम है ज़ुल्म ओ सितम काम है उसका
मगर इक ज़ुल्म कर ज़ालिम भी तड़पा रोज़ करता है
नहीं बस में उसके इक छाले का मदवा भी
मगर चारागर भी ईसा का दावा रोज़ करता है
नहीं है वस्ल ए उम्मीद अपने यार से लेकिन
ये कम है कि वो खिड़की से झांका रोज़ करता है
ये अख़्तर किस तरह की वाबस्तगी हुनर से तेरी
तू पहले ज़ख्म देता है और अच्छा रोज़ करता है
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
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