मुझ से इश्क़ करने की हिकमत नहीं तुम्हे
लगता है शायरों की आदत नहीं तुम्हे
वो ग़ज़ल कहे बस गज़ल कहे और मुझ पर कहे
क्या ऐसी वैसी कोई भी हसरत नहीं तुम्हे ?
इक मुद्दत से खुद को मैं दुनिया से छिपा कर
बस तुमको चाहता हूं की हैरत नहीं तुम्हे
मैं हूं अपने अंदाज़ का अकेला दीवाना
'अख़्तर' को चाहने की ज़रूरत नहीं तुम्हे
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें