रविवार, 24 नवंबर 2019

Ghazal : mera hai

ज़ालिम ने इस सलीके से काटी थी ये ज़ुबां
गर जो मैं बोल पड़ा हूं ये हुनर मेरा है 

बस वीरानियां ही इसमें रश्क करती है 
अब ये जैसा भी है ख्वाब नगर मेरा है 

मेरी नाकामी का इससे बड़ा सबूत क्या होगा
की मैं जिसपे हसंता हूं वो बर्बाद शहर मेरा है 

तू जिस दिल से राक़ीबों से मिला करता है
तेरे दिल में वो ख्वाबीदा-शरार मेरा है 

वो शब-ओ-रोज़ मुझे खुद से जुदा करता है 
और रोज़ दावा ये करता है कि 'अख़्तर' मेरा है 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

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