ज़ालिम ने इस सलीके से काटी थी ये ज़ुबां
गर जो मैं बोल पड़ा हूं ये हुनर मेरा है
बस वीरानियां ही इसमें रश्क करती है
अब ये जैसा भी है ख्वाब नगर मेरा है
मेरी नाकामी का इससे बड़ा सबूत क्या होगा
की मैं जिसपे हसंता हूं वो बर्बाद शहर मेरा है
तू जिस दिल से राक़ीबों से मिला करता है
तेरे दिल में वो ख्वाबीदा-शरार मेरा है
वो शब-ओ-रोज़ मुझे खुद से जुदा करता है
और रोज़ दावा ये करता है कि 'अख़्तर' मेरा है
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
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