मंगलवार, 12 नवंबर 2019

हो नहीं सकता

तू कोन है ये बात मुझे पहले ही बताता 
ऐसे तो तेरे साथ निभा हो नहीं सकता 

ज़ख्मों को लिए घुमा हूं मैं तो तमाम उम्र
ये रंग-ए-लहू है हिना हो नहीं सकता 

एक उम्र मैं खुद के साये से लड़ा हूं 
मैं चाहूं भी तो खुद से जुदा हो नहीं सकता 

हंसता हूं अपनी हालत पर करता हूं न कोई काम 
मैं क्या करूं मैं इससे बुरा हो नहीं सकता 

उसने मुझे कैद ही करने से किया इनकार 
इक मैं हूं चाह कर भी रिहा हो नहीं सकता

गिरता है जबीं सजदे को और दिल नहीं झुकता 
'अख़्तर' ऐसे तेरा नमाज़ अदा हो नहीं सकता 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...