तू कोन है ये बात मुझे पहले ही बताता
ऐसे तो तेरे साथ निभा हो नहीं सकता
ज़ख्मों को लिए घुमा हूं मैं तो तमाम उम्र
ये रंग-ए-लहू है हिना हो नहीं सकता
एक उम्र मैं खुद के साये से लड़ा हूं
मैं चाहूं भी तो खुद से जुदा हो नहीं सकता
हंसता हूं अपनी हालत पर करता हूं न कोई काम
मैं क्या करूं मैं इससे बुरा हो नहीं सकता
उसने मुझे कैद ही करने से किया इनकार
इक मैं हूं चाह कर भी रिहा हो नहीं सकता
गिरता है जबीं सजदे को और दिल नहीं झुकता
'अख़्तर' ऐसे तेरा नमाज़ अदा हो नहीं सकता
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें