गुरुवार, 21 नवंबर 2019

ग़ज़ल : ख़त्म हो गई

ऐलान हुआ है कि बेकारी ख़त्म हो गई
एक दो नहीं सारी की सारी ख़त्म ही गई

चार गूंगे इस तरफ चिल्ला रहे हक बोलिए 
और बहरा-शहर की बीमारी ख़त्म हो गई

वो पेहन के ताज बैठा है लाशों के ढेर पर
ऐसा लगता है उसकी ख़ूँ-ख़्वारी ख़त्म ही गई

ज़ुल्म-सितम से डर कर गर कर दूं मैं उसको सलाम
तो समझ लेना की मेरी ख़ुद-दारी ख़त्म हो गई

रातों-रात शहर के सारे खजाने लूट गए
लगता है शहर की पहरे दारी ख़त्म हो गई

मैंने भी दो चार पत्थर फेंक के मारे 'अख़्तर'
और उसकी सारी शीशा-कारी ख़त्म हो गई

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

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Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...