ऐलान हुआ है कि बेकारी ख़त्म हो गई
एक दो नहीं सारी की सारी ख़त्म ही गई
चार गूंगे इस तरफ चिल्ला रहे हक बोलिए
और बहरा-शहर की बीमारी ख़त्म हो गई
वो पेहन के ताज बैठा है लाशों के ढेर पर
ऐसा लगता है उसकी ख़ूँ-ख़्वारी ख़त्म ही गई
ज़ुल्म-सितम से डर कर गर कर दूं मैं उसको सलाम
तो समझ लेना की मेरी ख़ुद-दारी ख़त्म हो गई
रातों-रात शहर के सारे खजाने लूट गए
लगता है शहर की पहरे दारी ख़त्म हो गई
मैंने भी दो चार पत्थर फेंक के मारे 'अख़्तर'
और उसकी सारी शीशा-कारी ख़त्म हो गई
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
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