मंगलवार, 19 नवंबर 2019

ghazal : Kyun nahi hai

ग़म गर दरिया है तो उसका किनारा क्यूं नहीं है 
लब-ए-सनम पर ज़िक्र हमारा क्यूं नहीं है

मेरी सद-हजारां कोशिशों के बावजूद
मेरा हुनर आख़िर मुझ से हारा क्यूं नहीं है 

मेरी तनहाई तू मुझे मारने वाली है क्या 
गर ये सच है तो अब तक मारा क्यूं नहीं है 

मैं आज फिर उदास हो गया ये सोच के 
कि मेरे ऐब ने मुझ को निखारा क्यूं नहीं है 

अब हर बात पर चुप-चाप ही तो रहता हूं
मगर ये बात अब तुझको गवारा क्यूं नहीं है

ऐसा नहीं की 'अख़्तर' रोता ही नहीं है 
फिर अश्कों ने मुझे अबतक संवारा क्यूं नहीं है

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

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