मेरे हुनर ने आखिर क्या दिया मुझ को
बस ज़िन्दगी का बंदी बना दिया मुझ को
वो कोन था जो नींद ले उड़ा मेरा
वो कोन है जिसने सुला दिया मुझ को
तुझे तो शर्मसार हो के मारना है
इक फूल ने मर के बता दिया मुझ को
ये औरतों पे जुर्म ईमान बेच कर करता है
ऐ मर्द तूने तो शर्म से झुका दिया मुझ को
दो-चार बार हिजरत का करके तकिया-कलाम
वो सोचता है कि उसने डरा दिया मुझ को
इस तरह तो 'अख़्तर' भी नहीं जाने वाला
तेरे सितम ने पत्थर बना दिया मुझ को
~Akhtar Parwez Dehlvi
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