शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

Ghazal : diya mujh ko

मेरे हुनर ने आखिर क्या दिया मुझ को
बस ज़िन्दगी का बंदी बना दिया मुझ को

वो कोन था जो नींद ले उड़ा मेरा 
वो कोन है जिसने सुला दिया मुझ को

तुझे तो शर्मसार हो के मारना है 
इक फूल ने मर के बता दिया मुझ को

ये औरतों पे जुर्म ईमान बेच कर करता है
ऐ मर्द तूने तो शर्म से झुका दिया मुझ को

दो-चार बार हिजरत का करके तकिया-कलाम
वो सोचता है कि उसने डरा दिया मुझ को 

इस तरह तो 'अख़्तर' भी नहीं जाने वाला 
तेरे सितम ने पत्थर बना दिया मुझ को 

~Akhtar Parwez Dehlvi

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