रविवार, 1 दिसंबर 2019

Ghazal

इक बार मुझ पर भी यकीन कर के देख
और मेरे सारे हुनर फ़ित्नागर के देख 

रोया हूं इस कद्र मगर तुझको यकीं नहीं 
ऐसा कर ज़ालिम मेरे जिस्म में उतर के देख

तन्हा नहीं हूं गुफ्तगू होती है ख़ुद से रोज़
इक बार ख़ुद को भी तू हैरान कर के देख

इक रोशनी के वास्ते शहर को जला दिया 
आ जा मेरे शहर में तू जलवे हुनर के देख

नाखुदा अगर तुझे साहिल की चाह है 
तो ऐसे कर कश्ती को भंवर में कर के देख

तुझको भी रास आयेगी दुनिया-ए-रंज-ओ-गम
इक बार उसकी आंख के पैकर से उभर के देख

'अख़्तर' को भी नसीब हो जाए तेरी हुस्न ओ नज़ाकतें
दो चार दिन ज़ालिम 'अख़्तर' के घर में ठहर के देख

~Akhtar Parwez Dehlvi
फ़ित्नागर - mischievous
नाखुदा - Sailor

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Ghazal

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