मैं उसके पास से जब गुज़र जाता हूं
मैं तो नाज़ुक बदन हूं, बिखर जाता हूं
शब ओ रोज़ मैं नए सफर में निकलता हूं
जब मैं बिखर जाता हूं तब घर जाता हूं
अब उस कुच-ए-बुतखाने में ठिकाना है मेरा
जब जाहिद पूछता है तो कहता हूं कि ठहर जाता हूं
ऐसे तो उसको पाने के करता हूं फरेब
और कभी कभी इस बात से मुकर जाता हूं
ऐसे तो हिम्मत-ए-'अख़्तर' के किस्से मशहूर हैं
मगर वो सामने आता है तो डर जाता हूं
Akhtar Parwez Dehlvi
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