बुधवार, 28 अगस्त 2019

ग़ज़ल : तुझसे हम ऐसे तो किनारा न करेगे

तुझसे हम ऐसे तो किनारा न करेगे
पर तू मेरा है ऐसा भी दावा न करेगे

हर बात पे मेरी खोशामाद करे जो
ऐसा सनम हम भी गवारा न करेगे

इश्क़ के बेगैर शायर पूरा न बनेगा
और इश्क़ के बेगैर हम गुज़र न करेगे

हम वो बला हैं कि तुझे भूल गए तो
ता उम्र कभी ज़िक्र तुम्हारा न करेंगे

इश्क़ ने ही अख़्तर को बर्बाद किया है 
पर क्यूं कहें कि इश्क़ दोबारा न करेगे

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

सोमवार, 29 जुलाई 2019

जब गुज़र जाता हूं

मैं उसके पास से जब गुज़र जाता हूं
मैं तो नाज़ुक बदन हूं, बिखर जाता हूं

शब ओ रोज़ मैं नए सफर में निकलता हूं
जब मैं बिखर जाता हूं तब घर जाता हूं

अब उस कुच-ए-बुतखाने में ठिकाना है मेरा
जब जाहिद पूछता है तो कहता हूं कि ठहर जाता हूं

ऐसे तो उसको पाने के करता हूं फरेब
और कभी कभी इस बात से मुकर जाता हूं

ऐसे तो हिम्मत-ए-'अख़्तर' के किस्से मशहूर हैं
मगर वो सामने आता है तो डर जाता हूं

Akhtar Parwez Dehlvi

बुधवार, 3 जुलाई 2019

मैं इस क़दर तबाह हुआ हूं कि क्या कहूं

मैं इस क़दर तबाह हुआ हूं कि क्या कहूं
में बर्बाद-ए-बादशाह हुआ हूं कि क्या कहूं

मेरे कत्ल का मेरे सर पर इल्ज़ाम है
में अपना खुद-गवाह हुआ हूं कि क्या कहूं

उसको गुनहगार पसंद है उसकी नजर में मैं
इस क़दर बे-गुनाह हुआ हूं कि क्या कहूं

'अख़्तर' के क़ातिल ने 'अख़्तर' के सुनाए शेर
जो मैं वहां वाह-वाह हुआ हूं कि क्या कहूं

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

शनिवार, 15 जून 2019

ग़ज़ल : मुझे उससे मोहब्बत हो गई है

मुझे उससे मोहब्बत हो गई है
ये मुझे कैसी चाहत हो गई है

वो मेरे साथ बैठी थी कल तक
ना जाने अब किस की हो गई है

मैंने बहुत अजीब ख्वाब देखा
की वो फिर से मेरी हो गई है

न जाने किस सफर में आ गया हूं
मेरी मंज़िल ही मुझसे खो गई है

उसकी आंखो में खुद को पा लिया है
मगर वो चीज क्या है जो खो गई है

ऐसे खुद पे क्यों अकड़े हो 'अख़्तर'
ज़रा सी पहचान ही तो हो गई है

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

शनिवार, 1 जून 2019

ग़ज़ल : मान ले साकी

मेरी इक बात बहर-ए-खुदा मान ले साकी
पैमाना छोड़ तू आंखों से जान ले साकी

रहूं ना होश में कुछ इसक़दर पीला दे मुझे
फिर उसके बाद मेरे दिल का बयान ले साकी

पहले अपने एब को हुनर में तब्दील कर
फिर रफ्ता-रफ्ता अपनी उड़ान ले साकी

हुआ नाकाम तो मय खाने से निकाल देना मुझे
मगर उससे पहले मेरा इम्तिहान ले साकी

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

सोमवार, 27 मई 2019

ग़ज़ल : अच्छा होता

तू सबके साथ ना चलता तो अच्छा होता
कभी खुद से भी मिलता तो अच्छा होता

मेरी तन्हाइयों को समझता तो अच्छा होता
फिर मुझे मोहब्बत करता तो अच्छा होता

मेरे सनम तूने मुझे ये क्या बना डाला है
मेरा दिल पहले सा सच्चा होता तो अच्छा होता

मेरी जुबां को क़लम से काट कर बोला
काश तू झूठ ही कहता तो अच्छा होता

तू इतना परेशान है सदाक़त पसंद लगता है
वरना तेरा भी शहर में घर तो अच्छा होता

कल तुमने जो मुझे से बात कही थी 'अख़्तर'
वो बात खुद से भी कहता तो अच्छा होता 

उसने सच बोलने पे पाबंदी लगा रखी है
अख़्तर तू शायर न होता तो अच्छा होता

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

शुक्रवार, 24 मई 2019

Ghazal : Mulaqat Hui

फिर तसव्वुर में उनसे आज मुलाकात  हुई
मुख्तसर सी ही मगर आज उनसे बात हुई

वो भी शर्मा से गए हम भी शर्मा से गए
ऐसा ही चलता रहा और फिर सबात हुई

ख़्वाब मे भी वो रकीबों की ही बातें करता
ऐसा लगा की वो जीता और मेरी मात हुई

चाँदनी उसके तो रहती है चार-सू अक़्सर
ये भी इक अजब की हुस्न-ए-ताजरबात हुई

मुद्दतों बाद उसने खुद को फिर से पहचाना
मुद्दतों बाद जब 'अख़्तर' से मुलाकात हुई

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

मंगलवार, 21 मई 2019

Ghazal : क्या मिला आपको, उससे रुलाने से

क्या मिला आपको, उससे रुलाने से
जो हंस रहा था मेरे अफसाने से

अब तू किस किरदार में है ये बता
कल इक शख्स पूछ रहा था इक दीवाने से

वो जो ज़ख्म है दिखा नहीं सकता में
जो मुझे मिल रहे थे इक ज़माने से

इस दर्द की क्या दुआ दूं तुझे ऐ साकी
बिना पियाए ही निकाल दिया शराब-खाने से

अब कुछ चाह नहीं रही 'अख़्तर'
सब मिल गया है उससे पाने से

'अख़्तर' को बहर-ए-खुदा आजमाना छोड़
'अख़्तर' टूट जाता है जादा आजमाने से

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

सोमवार, 20 मई 2019

Ghazal : बयां कर नहीं सकता

ऐ ज़िन्दगी तुझे अल्फ़ाज़ों में बयां कर नहीं सकता 
तू ज़ख़्म ऐसे देती है जो भर नहीं सकता 

चुप हूँ जो अपने हालत पे तो कमज़ोर न समझ 
ऐसा भी न समझ की में कुछ कर नहीं सकता 

खुश भी इसलिए हूँ की हारना कबूल है 
में चंद ठोकरों से तो डर नहीं सकता 

अख़्तर तू अपने आदत से जल्दी से बाज़ आ 
ऐसी भी क्या शर्म की तू मर नहीं सकता 

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

रविवार, 19 मई 2019

ghazal : उसके कूचें में जो ठहरने वाला था

उसके कूचें में जो ठहरने वाला था
वो मेरा अहबाब निखारने वाला था

उसको खुद में ढूंढ रहा हूँ मुद्दत से
वो तो मुझमे एक घर करने वाला था

ज़िन्दगी ने हर मोड़ पे चोटें दी लेकिन
में भी कहाँ आसानी से बिखरने वाला था

जाने उसके इश्क़ ने क्या कमाल किया
वरना में थोड़ी सुधरने वाला था

किस्मत भी उस रस्ते पर आ कर बैठी थी
जो रास्ता में छोड़ के चलने वाला था

गोया उसको याद भी मेरी आयी कब
जब में उसके इश्क़ में मरने वाला था

इश्क़ ने तुझको तब भी घेर लिया 'अख़्तर'
तू तो उस रस्ते से,बच के निकलने वाला था

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...