शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

ghazal

ऐ ज़िन्दगी या तो तू मलाल कर इस सवाल पर
या मुझे हक दे की थोड़ा गम मना लूं हाल पर 

मैं तेरा आशिक़ हूं जानां और आशिक़ ज़ात भी 
तू ज़रा नज़रें उठा दे अपने इस जमाल पर

ज़िन्दगी जी लें या फिर खुद-ख़ुशी अंज़ाम हो 
मैं शब ओ रात सोचता बहुत हूं इस खयाल पर 

तू बड़ा शायर बना फिरता है 'अख़्तर' क्या है तू?
चल तू पहले इक शेर ही कह दे मेरे इस हाल पर

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

ग़ज़ल : बात बात पे

वो मुझ से यूं झगड़ता रहा बात बात पे
मैं भी ग़ज़ल लिखता रहा बात बात पे

झगड़े में कितनी बार लिया लब का बोसा
और वो आंखों को मलता रहा बात बात पे

मैंने अभी तक इश्क़ का किया नहीं इज़हार
लेकिन मैं उससे मिलता रहा बात बात पे

एक साथ सैकड़ों से इश्क़ मैंने कर लिया 
उसके बाद मैं हँसता रहा बात बात पे

'अख़्तर' यकीं कर मेरा जादू निगाह है वो 
और मैं आंखे ही देखता रहा बात बात पे 

Akhtar Parwez Dehlvi

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

ghazal :

साक़ी अब वो बात नहीं पैमाने में
बस बादा है तेरे इस बादा-खाने में

मेरी रात गुजरती थी उसके चौखट पर
फिर मुझे ढूंढने क्यूं आए हो मयखाने में

एक तो उसकी जुदाई उपर से गम-ए-फ़िराक़
और एक तो जी भी नहीं लग रहा वीराने में

मर गया 'अख़्तर' चलो जान छुट्टी उस पागल से
ये जुमला गूंज रहा था सनम खाने में

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

ghazal : chahati ho

तुम वो आशिक़ पुराना चाहती हो ?
माने दर्द फिर जगाना चाहती हो ? 

मेरी हर इक बात पर इख़्तिलाफ़ी 
कोई रिश्ता बनाना चाहती हो ?

मेरे पास मैं खुद भी नहीं हूं 
तुम किसको पाना चाहती हो ?

मेरे पास चंद आंसु और इक ग़म
तुम क्या लिखवाना चाहती हो ?

मैं तो इक दीवानी चाहता हूं
तुम भी इक दीवाना चाहती हो ?

'अख़्तर' को खुद से मोहब्बत भी नहीं
तुम 'अख़्तर' से दिल लगाना चाहती हो ?

Akhtar Parwez Dehlvi

गुरुवार, 30 जनवरी 2020

ghazal

आज तनहाई ने नाशाद कर दिया मुझको 
कि अपने कैद से आज़ाद कर दिया मुझको 

वो इक शख़्स जिसका नाम मुझे याद नहीं 
उसी शख़्स ने फ़रहाद कर दिया मुझको 

जिस ख़ुशी ने दामन भरे थे मेरे कभी
उसी ख़ुशी ने बर्बाद कर दिया मुझको 

अपने ऐब को कोसता रहा मैं मुद्दातों 
उसी ऐब ने उस्ताद कर दिया मुझको 

पता चला कि 'अख़्तर' को गम मिलेंगे यहां 
इस इक बात ने तो शाद कर दिया मुझको

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

शनिवार, 11 जनवरी 2020

ghazal : dagaa kar ke

फंसा दिया है तूफ़ान में किनारे ने दग़ा कर के
उसे सकून तो होगा मुझ को फ़ना कर के

समुंदर भी तो रोया था ज़ालिम तेरी ज़ुल्मत पर
वो अपना दुख बताता है किनारे से टकरा के

ये तेरा खुमार ए हुस्न मुझे बेकरार करता है
मैं तुझसे इसलिए मिलता हूं थोड़ा सा नशा कर के

मेरी आखों की बेचैनी तुझे बर्बाद न कर दे
मैं तुझसे बात करता हूं नज़रों को झुका कर के

सितारों मेरा दुख समझो झगडों न आसमां से तुम
तुम मेरा दर्द बढ़ा दोगे ज़मीं को खफा कर के

पिला न उनको अब साक़ी मीना मेरी ओर कर लेतू

 'अख़्तर' को होश में ले आ थोड़ी सी चखा कर के 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी 

बुधवार, 8 जनवरी 2020

ग़ज़ल : बात करें

कभी तो आप सितमगरों की बात करें 
कभी तो आप बे घरों की बात करें 

हमारे हाथ में मोहब्बत कि किताबें हैं
और आप पथरों की बात करें 

यहां पड़े है कितने लहू परिंदों के
और आप मंजरों की बात करें 

तुम्हारे आंख का कतरा लहू है न ?
फिर क्यूं समुंदरों की बात करें ?

'अख़्तर' तेरे बस कहां नज़्म समझना 
फिर भी चल सुख़न-वरों की बात करें 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

गुरुवार, 2 जनवरी 2020

ग़ज़ल : किस तरह

तुमसे हम अपनी नज़रें मिलाएंगे किस तरह 
तुम से हम दिल की बात बताएंगे किस तरह 

तुमने जो दिल में आग लगा दी है ठीक है
लेकिन ये बताओ कि भूझाएंगे किस तरह 

रस्ता तमाम मुझ को दिखाया है कोई और 
ऐसे तुम्हारे घर में हम आएंगे किस तरह 

हम ने भी मुस्कुरा के केह दिया सब ठीक है 
अब दिल में लगे घाव दिखाएंगे किस तरह 

हमने सुना है सब से वफा कर रहे हो तुम 
ऐसे रकीब तुमको आजमाएंगे किस तरह 

ये दर्द नुमा फन है तुम खुश नुमा वजूद
सुखंवरी तुम को सिखाएंगे किस तरह 

'अख़्तर' तू इस बात पर नाराज़ न होना 
पर तेरी ग़ज़ल पढ़ के होश में आएंगे किस तरह

अख़्तर परवेज़ देहलवी

बुधवार, 1 जनवरी 2020

ग़ज़ल: दोस्त

हम भी उम्मीद में हैं आएगा मयख़्वार ए दोस्त 
तब कहीं जा के इस बरस होगा दीदार ए दोस्त 

किया इलाज उसने इस दिल का कि मत पूछो
दे गया मुझे ग़म ए इश्क़ मेरा बीमार ए दोस्त

मैंने पहले ही कहा था कि मुझे दूर रहो, हां
अब हो गयाना तुझे ग़म मेरे ग़म-ख़्वार-ए-दोस्त

हाल मेरा क्या होता है मुझे क्या मालूम
जब जब देख लेता हूं मैं रुख़्सार ए दोस्त

पड़ी इक निग़ाह तो दीवाने उठ के बैठ गए 
अब ऐसे ही तो नहीं मशहूर बाज़ार ए दोस्त 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी 

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

Ghazal : diya mujh ko

मेरे हुनर ने आखिर क्या दिया मुझ को
बस ज़िन्दगी का बंदी बना दिया मुझ को

वो कोन था जो नींद ले उड़ा मेरा 
वो कोन है जिसने सुला दिया मुझ को

तुझे तो शर्मसार हो के मारना है 
इक फूल ने मर के बता दिया मुझ को

ये औरतों पे जुर्म ईमान बेच कर करता है
ऐ मर्द तूने तो शर्म से झुका दिया मुझ को

दो-चार बार हिजरत का करके तकिया-कलाम
वो सोचता है कि उसने डरा दिया मुझ को 

इस तरह तो 'अख़्तर' भी नहीं जाने वाला 
तेरे सितम ने पत्थर बना दिया मुझ को 

~Akhtar Parwez Dehlvi

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...