रविवार, 10 जनवरी 2021

ग़ज़ल

मुझ को दिलासा देती रही बेख़ुदी मेरी
मैं ख़ुद ही अपने आप से इंकार कर गया

सोचा जो मैंने उल्फ़त ए दुनिया किसे मिली
फिर से मैं अपने आप को बीमार कर गया

तुझ को नहीं है मुझ से मोहब्बत तो न सही 
ये कह के उस से आज में तकरार कर गया

मुझ को नहीं है अपने फ़न पे यकीन अब
मैं तेरे हुस्न ए ज़ात से इंकार कर गया

'अख़्तर' बद किस्मती है छूना न मुझ को तू
फिर ये न कहना कोनसा आज़ार कर गया

परवेज़ अख़्तर 

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

किताब

तुझे तोहफ़े में एक किताब दूं
वो किताब मैंने लिखी है जो
शायद थोड़ा ये कम कर दे 
तेरी मुझ से बेहिसी है जो

इस किताब में तेरा ज़िक्र है
तेरे हुस्न की तहरीर है
ये किताब तेरे ही नाम है 
ये तेरी ही जागीर है 

इस किताब में तेरा रोना है 
मगर रोने का कोई सबब नहीं 
इस किताब में तेरा फ़र्द है 
कि तुझे ख़ुशी की कोई तलब नहीं

फिर सोचता हूं 
ये किताब कहीं तेरे क़र्ब को बढ़ा न दे 
और मुझे तेरी नजरों में 
और नीचे गिरा न दे 

चल रहने दे 
तू किताब छोड़
मैं कुछ और ही सोच लेता हूं 
पर मेरे पास तो और कुछ भी नहीं 
मैं अपना वक़्त तोहफ़े में देता हूं


परवेज़ अख़्तर

शनिवार, 12 दिसंबर 2020

ग़ज़ल: क्या करोगे

यहीं मयकदा है यहीं रिंद तेरे मैं न आया तो क्या करोगे
सभी नज़र में दिल ओ घर में मुझी को पाया तो क्या करोगे

तुम मुझ से नज़रें चुरा रहे हो जवाब देते नहीं हो ख़त के
अब क़ासिद लेके सलाम आया तो क्या करोगे

मैं अपने सपनों से पस्त हूं यार कायरों में हैं नाम मेरे 
कहीं तुम्हारे नसीब में भी मैं ही आया तो क्या करोगे 

तुम इसे मोहब्बत जो कह रहे हो फ़क़त हवस है ये बदन की
तुम्हारी जिस्म कि उर्यानी का सवाल आया तो क्या करोगे

मुझे पिलाने पे हैं आमादा कुछ यार मेरे हिज्र कि ख़ातिर
और पी के मैंने जो उसका नाम गुनगुनाया तो क्या करोगे
       
इश्क़ का रास्ता बड़ा तवील है ये 'अख़्तर' होगा बात छोड़ो
मैं बुजदिली की उरूज पर हूं मैं चल न पाया तो क्या करोगे

परवेज़ अख़्तर

बुधवार, 25 नवंबर 2020

ग़ज़ल : किया गया


आज ख़ूब अपने आप से झगड़ा किया गया
हिम्मत जो बढ़ गई थी तो ऐसा किया गया

देखा कि पहले शहर में मज़लूम कितने हैं
फिर मुझ को इंतिख़ाब कर रुस्वा किया गया

रो रो के दर्द कहने की हिम्मत नहीं रही
काग़ज़ पे लिख कर शेर तमाशा किया गया

देखा जो आज बाज़ार में गुनाह की रस्में
पहले उसे छुआ गया फिर तौबा किया गया 

ऐसे तो ख़तम हो ही जाता मरज़-ला-दवा
पहले तो अपने यार को अच्छा किया गया

सोचा कि 'अख़्तर' रोज़ ये जाता किधर को है
जगकर अपनी परछाईं का पीछा किया गया

हंसते रहा हूं शब ए फ़िराक़ ए इश्क़ में
हां ठीक है 'अख़्तर' से बस इतना किया गया

परवेज़ अख़्तर

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

ग़ज़ल : लग रही थी

अहल ए शहर की गालियां वीरान लग रही थी
अहल ए जहां भी इस पर हैरान लग रही थी

थोड़ा जो मैं था टूटा तो फिर धज्जियां उड़ा दी
ऐ ज़िन्दगी मुझे तू नादान लग रही थी

हमने भी उसके आंसू देखे ज़मीं पे बिखरे 
ये रात भी बेचारी हलकान लग रही थी 

बस देखते ही मुझ को मिलने सभी हैं आए 
इन दर्द ओ ग़म से मेरी पहचान लग रही थी

टूटे सभी हैं रिश्ते अपना जिसे बनाया 
तन्हाइयां ही अब तो इम्कान लग रही थी

हमने उस वक्त ख़ुद को, है आजमाया 'अख़्तर'
जब ज़िन्दगी हमे भी आसान लग रही थी

परवेज़ अख़्तर

बुधवार, 18 नवंबर 2020

ग़ज़ल

मैं तो तुम्हारे साथ चलूंगा जिस सफ़र पे जाओगे
पर साथ न लेना तुम मेरा वरना तुम पछताओगे

मैंने पहले तुमसे कहा था अब क्यूं रोते पछताते हो
साथ न छोड़ूंगा मैं तुम्हारा जब तक हार न जाओगे 

सच है ज़िंदा लोग हैं लेकिन मुर्दों जैसे रहते हैं
कोई नहीं आएगा बहर कितना शोर मचाओगे

ठीक है रोना अच्छा है पर इतना रोना ठीक नहीं
रोते रोते आंखें सूखी अब क्या लहू बहाओगे ?

तुम्हारे गेसू सावन जैसे बादल जैसी आंखें है
देख के ऐसा लगता है कि तुम बरखा बरसाओगे

देखो 'अख़्तर' बात कहूं मैं बोलना बहुत ज़रूरी है
तुम इतना जो चुप रहते हो तो कायर ही कहलाओगे

परवेज़ अख़्तर

शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

किसी से इश्क़ भी करते नहीं हम

किसी से इश्क़ भी करते नहीं हम
फिर क्यूं अपने आप कि सुनते नहीं हम

न जाने कोन सा जादू किया है 
की अपने जिस्म में होते नहीं हम 

वो तेरा ग़म यह तक खींच लाया 
वगर्ना यूं कभी हंसते नहीं हम 

हमारे आंसुओं पे तंज़ करके 
वो कहता है कि अब रोते नहीं हम

बहुत ख़ुश मिज़ाजी मौसम है यारों
मगर अब रात भर सोते नहीं हम

गिला भी तुझसे क्या ऐ हम-सुख़नवर
वगर्ना शायर भी होते नहीं हम

परवेज़ अख़्तर

बुधवार, 5 अगस्त 2020

Ghazal

कहेंगे ज़ालिम को ज़ालिम, ज़रा भी कम नहीं होंगे
भले वो कुछ भी हो जाएं, कभी मोहतरम नहीं होंगे

मैं इसका ख़ुद ही शाहिद हूं तुम्हें कैसे पता होगा
तुम्हें लगता है कैसे, हंसते चेहरों को गम नहीं होंगे

मैं हंसता हूं या रोता हूं, ये काम खिलवत में होता है
अगर सर ए बाज़ार रोऊं तो, फिर वो पुर-नम नहीं होंगे

ये कैसा इश्क़ है तेरा, फ़ना होना तो लाज़िम था
जब वो मुझ को चूमेगा फिर वो हम, हम नहीं होंगे

तू मुझ को अब तो न तड़पा, करीब आजा करीब आजा
कहीं ऐसा न हो तू आए और दो अलम नहीं होंगे

'अख़्तर' में हुनर इक है वो रोता है बस रोता है
रोने का भी इक ग़म है कि वो पुर-ग़म नहीं होंगे

परवेज़ अख़्तर 

बुधवार, 29 जुलाई 2020

Ghazal

आज की रात कुछ और नज़ारे निकले 
जिसको देखा वही इश्क़ के मारे निकले

हो गई शाम तो रोते हुए विरानों में
लेके जिस्म अपना ख़ुद ही पुकारे निकले

खो गया जिस्म कहीं रात के अंधेरों में
मिल गया जिस्म कोई और शरारे निकले

जागता जिस्म है सोने नहीं देता इक शब
ज़िन्दगी हम भी कुछ इस तरह गुज़रे निकले

हो गए बर्बाद किया ख़ुद को तबाह हमने भी 
तब कहीं जा के इस दिल के ख़सारे निकले

तुम जो निकल आए रात में घर से अपने
ऐसा लगता है कि बे-वक़्त सितारे निकले

अब वो मुझे देख के कुछ ऐसे मुस्कुराते हैं
वो भी चाहते हैं कि अरमान हमारे निकले

परवेज़ अख़्तर

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

Ghazal : ho sakti hai

अपनी उससे भला बात भी हो सकती है 
ये भी हो सकता है खैरात भी हो सकती है

वो दानिस्ता हमारे दस्तरस से दूर हुए
और ये इश्क़ की रिवायात भी हो सकती है 

करीब इतना न आओ मुझे डर लगता है
करीब आने से इनायात भी हो सकती है 

ये भी सच है कि वो क़िस्मत में नहीं है मेरे
ये भी सच है कि मुलाक़ात भी हो सकती है

वो अलग बात है रुकना उसे कबूल न हो
ज़िन्दगी है, मुश्किल ए हालात भी हो सकती है 

ऐसा लगता है कि उसको डर है मेरे होना का
और 'अख़्तर' ये ख़्यालात भी हो सकती है

परवेज़ अख़्तर

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...