मैं ख़ुद ही अपने आप से इंकार कर गया
सोचा जो मैंने उल्फ़त ए दुनिया किसे मिली
फिर से मैं अपने आप को बीमार कर गया
तुझ को नहीं है मुझ से मोहब्बत तो न सही
ये कह के उस से आज में तकरार कर गया
मुझ को नहीं है अपने फ़न पे यकीन अब
मैं तेरे हुस्न ए ज़ात से इंकार कर गया
'अख़्तर' बद किस्मती है छूना न मुझ को तू
फिर ये न कहना कोनसा आज़ार कर गया
परवेज़ अख़्तर